News24x7: यूनिफॉर्म सिविल कोड पर प्रधानमंत्री मोदी का बड़ा बयान – क्या है इसका ऐतिहासिक और वर्तमान संदर्भ?


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में यूनिफॉर्म सिविल कोड (समान नागरिक संहिता) पर बयान देकर देशभर में एक नई बहस को जन्म दिया है। उनके बयान ने न केवल राजनीतिक बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने संविधान सभा की चर्चाओं और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों का उल्लेख करते हुए इसे भारत के लिए एक आवश्यक कदम बताया। समान नागरिक संहिता लंबे समय से एक विवादास्पद मुद्दा रहा है, जो समय-समय पर चर्चा में आता रहा है। प्रधानमंत्री के इस बयान के बाद यह मुद्दा एक बार फिर से राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गया है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मूल उद्देश्य देश के नागरिकों के लिए एक समान कानून व्यवस्था सुनिश्चित करना है, जो सभी धर्मों और समुदायों पर समान रूप से लागू हो। लेकिन इसे लागू करने की प्रक्रिया हमेशा जटिल रही है। इस लेख में, हम इस विषय के ऐतिहासिक संदर्भ, प्रधानमंत्री मोदी के विचार, इसके उद्देश्य और वर्तमान प्रतिक्रियाओं पर गहराई से चर्चा करेंगे।


संविधान सभा और समान नागरिक संहिता का ऐतिहासिक संदर्भ

यूनिफॉर्म सिविल कोड की नींव भारत के संविधान में रखी गई थी। जब संविधान का मसौदा तैयार किया जा रहा था, उस समय संविधान सभा में इस विषय पर गहन चर्चा हुई थी। अनुच्छेद 44 के तहत समान नागरिक संहिता को नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल किया गया, जो किसी भी राज्य की कानूनी व्यवस्था के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इस अनुच्छेद का उद्देश्य स्पष्ट था: देश में एक ऐसा कानून बनाना, जो धर्म, जाति, लिंग या समुदाय के आधार पर कोई भेदभाव न करे।

संविधान सभा में इस मुद्दे पर अलग-अलग विचार सामने आए। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने पर्सनल लॉ को समाप्त करने की वकालत की थी। उनका मानना था कि धार्मिक आधार पर बने अलग-अलग कानूनों से सामाजिक असमानता और भेदभाव को बढ़ावा मिलता है। उन्होंने तर्क दिया कि एक आधुनिक लोकतांत्रिक समाज में सभी नागरिकों के लिए समान कानून होना चाहिए। हालांकि, उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए इसे लागू करने का निर्णय भविष्य की सरकारों पर छोड़ दिया गया।


प्रधानमंत्री मोदी की राय: एक नई शुरुआत

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प्रधानमंत्री मोदी ने अपने बयान में इस मुद्दे को फिर से राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बना दिया है। उन्होंने डॉ. अंबेडकर के विचारों को आगे बढ़ाते हुए इसे समानता और सामाजिक न्याय की दृष्टि से आवश्यक बताया। मोदी ने कहा कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक समान कानून व्यवस्था सामाजिक और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करेगी।

प्रधानमंत्री ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि यह विषय केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि यह देश के हर नागरिक के अधिकारों और न्याय से जुड़ा हुआ है। उन्होंने पर्सनल लॉ के चलते होने वाली असमानताओं और जटिलताओं पर भी प्रकाश डाला। उनके अनुसार, वर्तमान में अलग-अलग धार्मिक कानूनों के कारण कई बार नागरिकों के अधिकारों का हनन होता है, और यह स्थिति सुधार की मांग करती है।

मोदी ने इस मुद्दे पर राजनीति से ऊपर उठने की अपील करते हुए कहा कि यूनिफॉर्म सिविल कोड का मकसद किसी धर्म या समुदाय को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि सभी के लिए समान अधिकार सुनिश्चित करना है। उन्होंने इसे भारत के विकास और सामाजिक एकता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया।


यूनिफॉर्म सिविल कोड का उद्देश्य और इसके लाभ

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मुख्य उद्देश्य देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करना है, चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या समुदाय से संबंधित हों। वर्तमान में, भारत में अलग-अलग धर्मों के लिए विभिन्न पर्सनल लॉ लागू हैं, जो विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और संपत्ति से संबंधित मामलों को नियंत्रित करते हैं।

इन भिन्नताओं के चलते अक्सर असमानता की स्थिति उत्पन्न होती है। उदाहरण के लिए, तलाक या संपत्ति विवादों में विभिन्न धर्मों के कानून अलग-अलग प्रावधान रखते हैं, जो महिलाओं के अधिकारों को प्रभावित कर सकते हैं। समान नागरिक संहिता इन असमानताओं को समाप्त करके एक आधुनिक और न्यायपूर्ण व्यवस्था स्थापित करने की दिशा में प्रयास करता है।

इसका उद्देश्य केवल कानूनी सुधार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लैंगिक समानता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय को भी बढ़ावा देता है। यह सुनिश्चित करता है कि देश में सभी नागरिकों को समान अधिकार और न्याय मिले, जो किसी भी आधुनिक समाज का आधार है।


राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ

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यूनिफॉर्म सिविल कोड पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया हमेशा से विभाजित रही है। जहां एक ओर इसे प्रगतिशील और आधुनिक कदम माना जाता है, वहीं दूसरी ओर कुछ समुदाय इसे अपनी धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप के रूप में देखते हैं।

विपक्षी दल और कई सामाजिक संगठनों का मानना है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करना भारत की सांस्कृतिक विविधता और धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकता है। उनका तर्क है कि भारत जैसे देश में, जहां विभिन्न धर्मों और समुदायों की परंपराएं और मान्यताएं गहराई से जुड़ी हुई हैं, एक समान कानून व्यवस्था बनाना आसान नहीं है।

हालांकि, इसके समर्थक इसे एक न्यायपूर्ण और प्रगतिशील कदम मानते हैं। उनका कहना है कि यह कदम भारत को एक आधुनिक राष्ट्र बनाने में मदद करेगा, जहां हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त होंगे।


संभावित चुनौतियाँ

यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसे देश के सभी समुदायों द्वारा स्वीकार किया जाए। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां हर धर्म और समुदाय की अपनी परंपराएं और मान्यताएं हैं, यह सुनिश्चित करना मुश्किल हो सकता है कि एक समान कानून सभी के लिए अनुकूल हो।

इसके अलावा, राजनीतिक दलों के बीच भी इस मुद्दे पर सहमति बनाना एक जटिल कार्य होगा। इस विषय पर अक्सर राजनीतिक लाभ-हानि को ध्यान में रखते हुए प्रतिक्रियाएं दी जाती हैं, जिससे समाधान ढूंढना और भी कठिन हो जाता है।


निष्कर्ष

प्रधानमंत्री मोदी द्वारा दिया गया बयान यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा को एक बार फिर से राष्ट्रीय स्तर पर केंद्रित कर चुका है। यह मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

समान नागरिक संहिता का उद्देश्य देश में समानता और एकता को मजबूत करना है, लेकिन इसे लागू करने से पहले सभी समुदायों और पक्षों की चिंताओं पर विचार करना आवश्यक है। यह तभी संभव है जब इस विषय पर व्यापक संवाद और सहमति बनाई जाए।

भारत जैसे लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण देश में, यूनिफॉर्म सिविल कोड सही तरीके से लागू किया जाए तो यह न केवल सामाजिक न्याय को सुनिश्चित करेगा, बल्कि देश को आधुनिकता और प्रगति की दिशा में भी अग्रसर करेगा। अब यह देखना होगा कि सरकार इस दिशा में क्या ठोस कदम उठाती है और देश इसके लिए कितना तैयार है।


जय हिंद 🇮🇳

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