जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में वैचारिक टकराव का इतिहास काफी पुराना है। यह संस्थान अकादमिक उपलब्धियों के साथ-साथ अपने विचारधारात्मक संघर्षों के लिए भी जाना जाता है। इस बार विवाद की वजह गोधरा कांड पर आधारित फिल्म साबरमती रिपोर्ट बनी। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) द्वारा आयोजित इस स्क्रीनिंग कार्यक्रम ने जेएनयू परिसर में एक नई बहस को जन्म दिया।
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स्क्रीनिंग से पहले ही वामपंथी छात्र संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह फिल्म ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर सांप्रदायिक एजेंडा बढ़ावा देती है। इस विरोध प्रदर्शन में पोस्टर फाड़ने और नारेबाजी की घटनाएं हुईं, जिससे पूरे कैंपस का माहौल गर्मा गया। एबीवीपी का कहना है कि यह फिल्म गोधरा कांड के तथ्यों को जनता के सामने लाने का प्रयास है। इस घटना ने न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े किए, बल्कि जेएनयू में विचारधारा के नाम पर होने वाले ध्रुवीकरण को भी उजागर किया।
वामपंथी छात्रों का आरोप: सांप्रदायिक एजेंडा या इतिहास का तोड़-मरोड़?
वामपंथी छात्र संगठनों ने स्क्रीनिंग के दौरान जमकर विरोध प्रदर्शन किया। उनका आरोप है कि साबरमती रिपोर्ट जैसी फिल्में सांप्रदायिकता को बढ़ावा देती हैं और समाज में विभाजनकारी विचारधारा को फैलाने का प्रयास करती हैं। उनका यह भी कहना है कि जेएनयू जैसे शैक्षणिक संस्थान में ऐसी फिल्में दिखाने का उद्देश्य छात्रों को एकतरफा विचारधारा में ढालना है।
वामपंथियों ने फिल्म पर आरोप लगाया कि इसमें गोधरा कांड के तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है। उनके अनुसार, यह फिल्म किसी राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा है, जिसका मकसद सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देना है। वामपंथी छात्र संगठनों ने एबीवीपी पर यह भी आरोप लगाया कि वे इस स्क्रीनिंग के जरिए जेएनयू जैसे संस्थान का राजनीतिकरण करना चाहते हैं।
इस विरोध प्रदर्शन के दौरान पोस्टर फाड़ने और नारेबाजी की घटनाओं ने मामले को और विवादास्पद बना दिया। वामपंथी संगठनों का मानना है कि ऐसी घटनाएं परिसर के शांतिपूर्ण माहौल को खराब करती हैं।
एबीवीपी का पक्ष: सच्चाई दिखाने का प्रयास या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन?
एबीवीपी ने वामपंथी संगठनों के विरोध पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि साबरमती रिपोर्ट एक ऐसी फिल्म है, जो गोधरा कांड की सच्चाई को उजागर करती है। एबीवीपी के अनुसार, इस फिल्म में केवल तथ्यों को दिखाया गया है, जिसे जानने का अधिकार हर व्यक्ति को है।
एबीवीपी के नेताओं ने वामपंथी छात्रों पर आरोप लगाया कि वे हमेशा राष्ट्रवादी विचारधारा से जुड़े कार्यक्रमों का हिंसक विरोध करते हैं। उन्होंने कहा कि पोस्टर फाड़ना और कार्यक्रम को बाधित करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है।
उनका यह भी कहना है कि जेएनयू में वामपंथी संगठनों ने विचारधारा के नाम पर हिंसा और अराजकता का माहौल बनाया हुआ है। एबीवीपी ने प्रशासन से मांग की कि वह इस तरह की घटनाओं पर सख्त कार्रवाई करे और कैंपस में शांति बनाए रखे।
प्रशासन की भूमिका: समाधान या केवल अपील?

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घटना के तुरंत बाद जेएनयू प्रशासन ने दोनों पक्षों को शांत रहने की अपील की। प्रशासन ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान विचार-विमर्श और बहस के लिए हैं, न कि हिंसा और अराजकता के लिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि परिसर में वैचारिक मतभेदों को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाया जाना चाहिए।
प्रशासन ने यह भी कहा कि वे इस मामले की जांच करेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों। हालांकि, इस घटना ने यह सवाल भी खड़ा किया कि प्रशासन किस हद तक कैंपस में शांति बनाए रखने में सक्षम है।
छात्रों की प्रतिक्रिया: विभाजित राय और नए सवाल
इस घटना ने छात्र समुदाय को भी दो हिस्सों में बांट दिया है। जहां कुछ छात्रों का मानना है कि वामपंथी संगठनों का यह विरोध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन है, वहीं अन्य छात्रों का कहना है कि सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने वाली किसी भी गतिविधि पर रोक लगनी चाहिए।
कुछ छात्रों का यह भी मानना है कि एबीवीपी और वामपंथी संगठनों के बीच का यह टकराव कैंपस के माहौल को खराब कर रहा है। उनके अनुसार, वैचारिक मतभेदों को बातचीत और संवाद के जरिए सुलझाया जाना चाहिए, न कि हिंसा और विरोध के जरिए।
निष्कर्ष: विचारधाराओं का टकराव या संवाद की जरूरत?
जेएनयू में साबरमती रिपोर्ट की स्क्रीनिंग पर हुआ विवाद केवल एक घटना नहीं है। यह कैंपस में लंबे समय से चल रहे वैचारिक संघर्ष का प्रतीक है। यह घटना न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्व को उजागर करती है, बल्कि यह भी सवाल खड़ा करती है कि शैक्षणिक संस्थानों में वैचारिक विविधता और स्वतंत्रता को कैसे संतुलित किया जाए।
विचारधारात्मक संघर्षों के चलते जेएनयू बार-बार राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आता है। यह आवश्यक है कि ऐसे विवादों को सुलझाने के लिए संवाद और विचार-विमर्श को प्राथमिकता दी जाए।
अब सभी की निगाहें प्रशासन की अगली कार्रवाई और कैंपस में शांति स्थापित करने के प्रयासों पर टिकी हैं। सवाल यह है कि क्या जेएनयू में इस तरह की घटनाएं रुकेंगी, या वैचारिक टकराव का यह सिलसिला यूं ही चलता रहेगा? क्या शैक्षणिक संस्थान केवल शिक्षा के केंद्र बने रहेंगे, या फिर वैचारिक और राजनीतिक संघर्ष का मैदान?
इन सवालों का जवाब जेएनयू प्रशासन, छात्रों और पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण है। समाधान की ओर कदम तभी बढ़ सकता है जब दोनों पक्ष वैचारिक भिन्नताओं को संवाद और तर्क के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करें।
जय हिंद 🇮🇳
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