बुधवार की सुबह मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी के तट पर स्थित भट्याण आश्रम में प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु सियाराम बाबा ने अपनी अंतिम सांस ली। 110 वर्ष की लंबी और प्रेरणादायक जीवन यात्रा को पूर्ण करते हुए बाबा का जाना एक युग का अंत है। आध्यात्मिकता और समाज सेवा के प्रति उनका समर्पण अद्वितीय था, और उनके निधन से उनके अनुयायियों और समाज को गहरा आघात लगा है। बाबा का जीवन एक उदाहरण था कि कैसे अध्यात्म और मानव सेवा का संगम समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है।

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उनके अनुयायियों और भक्तों में शोक की लहर दौड़ गई है, और पूरे देश से लोग उनके प्रति अपनी श्रद्धांजलि व्यक्त कर रहे हैं। बाबा का योगदान न केवल आध्यात्मिक क्षेत्र में बल्कि समाज सुधार और पर्यावरण संरक्षण के कार्यों में भी अतुलनीय था। उनके विचार और शिक्षाएं आज भी लाखों लोगों के जीवन में मार्गदर्शक की भूमिका निभा रही हैं।
सियाराम बाबा: आध्यात्मिकता और समाज सेवा का प्रतीक
सियाराम बाबा का जीवन पूरी तरह से आध्यात्मिकता और मानव सेवा के प्रति समर्पित था। उन्होंने नर्मदा तट पर स्थित भट्याण आश्रम की स्थापना की, जो आज भी आध्यात्मिकता और समाजसेवा का केंद्र है। बाबा का मानना था कि सच्चा आध्यात्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दूसरों की भलाई के लिए किए गए कार्यों में झलकता है।
उनके प्रवचन सरल और प्रभावशाली थे, जो लोगों को मानवता, दया और सहिष्णुता का संदेश देते थे। बाबा का कहना था, “आध्यात्मिकता का असली मतलब दूसरों की मदद करना और समाज को बेहतर बनाने में योगदान देना है।” उनके जीवन में यह दर्शन हर कार्य में दिखाई देता था।
भट्याण आश्रम न केवल धार्मिक साधना का स्थान था, बल्कि यह गरीब और जरूरतमंदों की मदद करने का केंद्र भी बन गया। यहां बाबा ने शिक्षा, स्वच्छता और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर काम किया और इन क्षेत्रों में समाज को जागरूक किया। गरीब बच्चों को शिक्षा का अवसर देना, भूखों को भोजन कराना, और जरूरतमंदों को आश्रय प्रदान करना बाबा की प्राथमिकताओं में शामिल था।
उनके “नर्मदा सेवा अभियान” ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति लोगों को जागरूक किया। बाबा का कहना था कि नर्मदा नदी केवल एक जल स्रोत नहीं, बल्कि जीवनदायिनी है, और इसका संरक्षण हमारी जिम्मेदारी है। इस अभियान ने हजारों लोगों को प्रेरित किया और नर्मदा नदी की स्वच्छता और संरक्षण के प्रति जन जागरूकता बढ़ाई।
स्वास्थ्य समस्याएं और अंतिम क्षण
पिछले कुछ वर्षों से बाबा का स्वास्थ्य धीरे-धीरे गिर रहा था। उनकी उम्र और कठिन साधना के बावजूद उन्होंने अपनी दिनचर्या में बदलाव नहीं किया। उनका मानना था कि अनुशासन और साधना से जीवन की हर समस्या का समाधान संभव है।

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हालांकि, पिछले दस दिनों में उनकी तबीयत अधिक बिगड़ गई थी। इंदौर से डॉक्टरों की एक टीम उनके स्वास्थ्य की निगरानी कर रही थी, और उनके अनुयायी दिन-रात उनकी सेवा में लगे हुए थे। बुधवार की सुबह 6:30 बजे, जब पूरा आश्रम एकादशी के उपवास के लिए तैयार हो रहा था, बाबा ने अपनी अंतिम सांस ली।
उनकी मृत्यु को उनके अनुयायी ईश्वरीय योजना मानते हैं। बाबा के भक्तों का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी शांति और ध्यान बनाए रखा। उनकी सादगी और अध्यात्मिकता उनके अंतिम समय तक उनके जीवन का हिस्सा बनी रही।
अंतिम दर्शन के लिए उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
सियाराम बाबा के निधन की खबर फैलते ही उनके अनुयायियों और भक्तों का हुजूम भट्याण आश्रम में उमड़ पड़ा। लोग देश के कोने-कोने से उनके अंतिम दर्शन के लिए पहुंचे। आश्रम में हर ओर शोक और श्रद्धा का माहौल था। भक्तों ने बाबा को एक पथ-प्रदर्शक, पिता समान और समाज का सुधारक मानते हुए अपनी भावनाएं व्यक्त कीं।
आश्रम के एक वरिष्ठ सदस्य ने बताया, “बाबा हमारे लिए केवल गुरु नहीं थे, बल्कि एक प्रेरणा थे। उन्होंने हमें सिखाया कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज सेवा और मानवता में है।”
बाबा की अंतिम यात्रा के लिए विशेष तैयारियां की जा रही हैं। उनकी इच्छानुसार, उनका अंतिम संस्कार नर्मदा नदी के तट पर किया जाएगा। इस पवित्र स्थल पर हजारों लोग एकत्र हो रहे हैं, जो बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित करना चाहते हैं। बाबा के जाने से उनके अनुयायियों के जीवन में एक खालीपन आ गया है, लेकिन वे उनकी शिक्षाओं को आगे बढ़ाने का संकल्प ले रहे हैं।
बाबा की शिक्षाएं और समाज के प्रति योगदान
सियाराम बाबा ने अपने जीवन से यह दिखाया कि आध्यात्म और समाज सेवा का संगम समाज में बदलाव ला सकता है। उनके “नर्मदा सेवा अभियान” ने पर्यावरण संरक्षण के प्रति एक नई दृष्टि प्रदान की। इसके अलावा, उन्होंने शिक्षा, स्वच्छता और स्वास्थ्य पर जोर देते हुए समाज को जागरूक किया।
बाबा का मानना था कि गरीबों और जरूरतमंदों की सेवा सबसे बड़ा धर्म है। उनके आश्रम में गरीब बच्चों की शिक्षा का प्रबंध किया जाता था। इसके साथ ही, वहां नियमित रूप से स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए जाते थे, जहां मुफ्त दवाइयों और चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जाती थीं।
उनकी शिक्षाएं केवल धार्मिक नहीं थीं, बल्कि वे हर व्यक्ति को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझने के लिए प्रेरित करती थीं। बाबा का जीवन इस बात का उदाहरण है कि सच्चा धर्म वही है, जो दूसरों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए।
निष्कर्ष: बाबा की शिक्षाओं को आगे बढ़ाने का संकल्प
सियाराम बाबा का निधन न केवल उनके अनुयायियों के लिए, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरी क्षति है। उनका जीवन और उनकी शिक्षाएं आज भी प्रेरणा का स्रोत बनी हुई हैं। उनके अनुयायियों ने यह संकल्प लिया है कि वे बाबा की शिक्षाओं और उनके अधूरे कार्यों को आगे बढ़ाएंगे।
बाबा के विचार हमें यह सिखाते हैं कि जीवन का असली उद्देश्य दूसरों की सेवा और मानवता के कल्याण में है। उनकी शिक्षाएं और उनके द्वारा किए गए कार्य हमेशा हमें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते रहेंगे।
सियाराम बाबा ने अपने जीवन से जो आदर्श स्थापित किए, वे सदैव याद रखे जाएंगे। उनका भौतिक शरीर भले ही हमारे बीच न हो, लेकिन उनकी आत्मा, उनके विचार, और उनकी शिक्षाएं हमेशा जीवित रहेंगी। यह समाज के प्रति उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
जय हिंद 🇮🇳
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