मेरठ, उत्तर प्रदेश – होली के दौरान मेरठ स्थित एक निजी विश्वविद्यालय में खुले में नमाज अदा करने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इस मामले ने तूल पकड़ लिया, जिसके बाद पुलिस ने हस्तक्षेप करते हुए जांच शुरू कर दी है। विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि परिसर में किसी भी धार्मिक गतिविधि के लिए पूर्व अनुमति आवश्यक होती है, जबकि सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर लोगों की मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है।
IIMT यूनिवर्सिटी में खुले में नमाज, वीडियो वायरल होते ही बढ़ा विवाद
यह मामला मेरठ के आईआईएमटी यूनिवर्सिटी का है, जहां छात्र मोहम्मद खालिद प्रधान ने कथित तौर पर करीब 50 अन्य लोगों के साथ खुले में नमाज अदा की। विश्वविद्यालय परिसर के भीतर इस तरह के धार्मिक आयोजन को लेकर पहले भी नियम बने हुए हैं, लेकिन इस बार इसका वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आते ही मामला गरमा गया।


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वीडियो में दिखाई दे रहा है कि छात्र समूह के साथ खुले मैदान में नमाज अदा कर रहा था। इस वीडियो के वायरल होते ही सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई, जिसमें कुछ लोगों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता का मामला बताया, जबकि कुछ ने विश्वविद्यालयों में इस तरह की गतिविधियों पर सख्त नियम लागू करने की मांग की।
पुलिस की कार्रवाई, FIR दर्ज
मामले के तूल पकड़ने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस ने इस घटना को लेकर त्वरित कार्रवाई की। अधिकारियों के अनुसार, आईआईएमटी यूनिवर्सिटी के नियमों के तहत किसी भी धार्मिक गतिविधि के लिए प्रशासन से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है।
पुलिस ने इस नियम के उल्लंघन को गंभीरता से लेते हुए आरोपी छात्र मोहम्मद खालिद प्रधान के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का सम्मान किया जाता है, लेकिन सार्वजनिक स्थानों या शैक्षणिक संस्थानों में कोई भी आयोजन संबंधित नियमों के अनुसार ही होना चाहिए।
मेरठ पुलिस ने बताया कि इस मामले में विस्तृत जांच की जा रही है और आरोपी छात्र से पूछताछ की जा रही है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है और किसी भी नियम का उल्लंघन होने पर उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
सोशल मीडिया पर बंटी राय, धार्मिक स्वतंत्रता बनाम संस्थागत नियमों की बहस
सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर जनता की राय विभाजित नजर आ रही है।
- कुछ लोगों का मानना है कि नमाज अदा करना हर व्यक्ति का संवैधानिक अधिकार है और इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
- दूसरी ओर, कुछ लोग विश्वविद्यालयों में धार्मिक गतिविधियों पर नियंत्रण की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं, ताकि परिसर की शैक्षणिक और अनुशासनात्मक व्यवस्था प्रभावित न हो।
- कुछ लोगों ने इस मामले की तुलना अन्य घटनाओं से करते हुए तर्क दिया कि अगर अन्य धर्मों के अनुयायियों को परिसर में पूजा-अर्चना की अनुमति नहीं है, तो फिर यह विशेष मामला क्यों उठाया जा रहा है?
हालांकि, कई लोगों ने इस पूरे मुद्दे को संवेदनशील मानते हुए संयम बरतने और अफवाहों से बचने की अपील भी की है।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने दिया बयान, नियमों के पालन की अपील
आईआईएमटी यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए स्पष्ट किया कि विश्वविद्यालय में किसी भी धार्मिक आयोजन से पहले अनुमति लेना अनिवार्य होता है। प्रशासन के अनुसार, शिक्षण संस्थानों का प्राथमिक उद्देश्य शिक्षा और अनुसंधान है, और किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि परिसर की अनुशासनात्मक नीतियों के अनुसार ही होनी चाहिए।

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विश्वविद्यालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, “हम सभी धर्मों का सम्मान करते हैं, लेकिन विश्वविद्यालय के भीतर कोई भी सामूहिक धार्मिक आयोजन बिना अनुमति के नहीं किया जा सकता। यह नियम परिसर में अनुशासन बनाए रखने के लिए लागू किए गए हैं।”
इसके साथ ही प्रशासन ने छात्रों से अपील की कि वे विश्वविद्यालय के नियमों का पालन करें और किसी भी प्रकार की गतिविधि में शामिल होने से पहले संबंधित अधिकारियों से अनुमति लें।
शांति बनाए रखने की अपील, पुलिस प्रशासन सतर्क
मेरठ पुलिस ने इस मामले को लेकर शांति बनाए रखने की अपील की है। अधिकारियों ने लोगों से अनुरोध किया है कि वे किसी भी अफवाह पर विश्वास न करें और किसी भी भ्रामक जानकारी को फैलाने से बचें।
पुलिस प्रशासन का कहना है कि विश्वविद्यालय परिसर में कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जा रहे हैं। पुलिस यह सुनिश्चित कर रही है कि किसी भी पक्ष की भावनाएं आहत न हों और सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।
मेरठ के पुलिस अधीक्षक (SP) ने कहा, “हम इस मामले की निष्पक्ष जांच कर रहे हैं। सभी पक्षों की बात सुनी जाएगी और जो भी नियमों का उल्लंघन करेगा, उसके खिलाफ उचित कार्रवाई की जाएगी। हमारा उद्देश्य किसी एक पक्ष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो जिससे विश्वविद्यालय परिसर में अशांति फैले।”
निष्कर्ष: विवाद के बाद नियमों को लेकर चर्चा जारी
यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता बनाम संस्थागत अनुशासन के सवाल को एक बार फिर चर्चा में ले आया है। विश्वविद्यालयों में धार्मिक गतिविधियों को लेकर पहले भी बहस होती रही है, लेकिन इस तरह के विवाद यह दिखाते हैं कि इस मुद्दे पर स्पष्ट नियमों और संवाद की जरूरत है।
फिलहाल, मेरठ पुलिस मामले की जांच कर रही है और विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों को नियमों का पालन करने की सलाह दी है। सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर लगातार चर्चा हो रही है, लेकिन प्रशासन ने स्थिति को नियंत्रित रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने का आश्वासन दिया है।
जय हिंद 🇮🇳
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