News24x7: मस्जिद में ‘जय श्री राम’ का नारा – सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला!


भारत के संवैधानिक ढांचे में धर्मनिरपेक्षता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया, जिसमें मस्जिद में ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने को अपराध नहीं माना गया। यह मामला कर्नाटक का है, जहां दो व्यक्तियों के खिलाफ मस्जिद में धार्मिक नारे लगाने पर एफआईआर दर्ज की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि धार्मिक नारों को तब तक अपराध नहीं माना जा सकता जब तक वे समाज में हिंसा या कानून-व्यवस्था का उल्लंघन न करें। इस निर्णय ने संविधान के अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को फिर से मजबूत किया है।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां और रुख

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के दौरान जोर देकर कहा कि किसी धार्मिक नारे को केवल उसकी धार्मिक प्रकृति के आधार पर अपराध की श्रेणी में रखना उचित नहीं है। अदालत ने कहा कि यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि किसी भी तरह की कानूनी कार्रवाई से पहले इस बात पर ध्यान दिया जाए कि उस कृत्य से सार्वजनिक शांति भंग हुई है या नहीं।

अदालत ने अपने फैसले में कहा, “‘जय श्री राम’ का नारा लगाना व्यक्तिगत आस्था का प्रतीक है। इसे किसी धर्म के खिलाफ उकसावे या अपराध के रूप में देखना तब तक गलत होगा, जब तक यह नफरत, हिंसा, या सार्वजनिक अव्यवस्था को बढ़ावा न दे।” सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 19 और 25 के संदर्भ में देखा, जो क्रमशः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक आस्था की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करते हैं।

अदालत ने कहा कि भारत जैसे बहुधर्मी और बहुसांस्कृतिक देश में संवेदनशीलता और सहिष्णुता का संतुलन बनाना जरूरी है। धार्मिक नारों को लेकर उठने वाले विवादों में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कानून का दुरुपयोग न हो और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान बना रहे।


कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट का समर्थन

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13 सितंबर 2023 को कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए मस्जिद में ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वाले दो व्यक्तियों के खिलाफ एफआईआर रद्द कर दी थी। हाईकोर्ट ने कहा था कि इस मामले में ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि इन नारों के कारण कानून-व्यवस्था भंग हुई हो।

इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अदालत ने कहा कि संवैधानिक मूल्यों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, और समाज के सामूहिक हितों पर विचार करना किसी भी कानूनी कार्रवाई का आधार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल धार्मिक आस्था या नारों के आधार पर किसी को अपराधी ठहराना न्यायसंगत नहीं है।

यह फैसला इस बात को दोहराता है कि भारत का कानूनी ढांचा धर्मनिरपेक्षता और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए बनाया गया है। अदालत ने यह सुनिश्चित किया कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक आस्था या अभिव्यक्ति के लिए दंडित नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह समाज में अशांति का कारण न बने।


धर्मनिरपेक्षता और कानून का संतुलन

भारत का संविधान अपने नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, जो अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित है। इसके अंतर्गत हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करने और अपनी धार्मिक आस्था को व्यक्त करने का अधिकार है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक शांति और व्यवस्था बनाए रखने की शर्तों के साथ सीमित है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के माध्यम से यह संदेश दिया कि धार्मिक आस्था और अभिव्यक्ति को अपराध की श्रेणी में नहीं डाला जा सकता, जब तक कि वह समाज में नफरत या हिंसा फैलाने का कारण न बने। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान है।

यह फैसला एक संतुलन प्रस्तुत करता है—जहां धार्मिक आस्थाएं व्यक्त की जा सकती हैं, लेकिन इसका उपयोग समाज में तनाव उत्पन्न करने या दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी कानूनी निर्णय को निष्पक्षता और साक्ष्यों के आधार पर लिया जाना चाहिए।


फैसले के व्यापक प्रभाव

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सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे देश में धार्मिक अभिव्यक्ति और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों पर प्रभाव डालेगा। यह उन मामलों के लिए मिसाल बनेगा, जहां धार्मिक नारों के आधार पर कानूनी कार्रवाई की जाती है।

फैसले से यह भी स्पष्ट हुआ है कि एफआईआर दर्ज करने से पहले साक्ष्यों और परिस्थितियों का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है। इस निर्णय ने न्यायपालिका की भूमिका को धर्मनिरपेक्ष समाज में शांति और सौहार्द बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक के रूप में स्थापित किया है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से उन मामलों में अनावश्यक विवादों को कम करने में मदद मिलेगी, जहां धार्मिक नारों को लेकर शिकायतें दर्ज की जाती हैं। यह निर्णय न केवल धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा देगा, बल्कि संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला न केवल संविधान की मूलभूत अवधारणाओं की रक्षा करता है, बल्कि धार्मिक सहिष्णुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी प्रोत्साहित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी धार्मिक नारे को अपराध मानने से पहले साक्ष्यों और उसकी परिस्थितियों का ध्यानपूर्वक विश्लेषण करना आवश्यक है।

यह फैसला भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को मजबूत करने और नागरिक अधिकारों की रक्षा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल धार्मिक विवादों को सुलझाने में मदद करेगा, बल्कि समाज में आपसी सहिष्णुता और शांति बनाए रखने में भी सहायक होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि भारत के नागरिक अपनी धार्मिक आस्था और अभिव्यक्ति के अधिकार का उपयोग बिना किसी डर या भेदभाव के कर सकें। इस फैसले ने न्यायपालिका की निष्पक्षता और संवेदनशीलता को भी उजागर किया है।

यह फैसला एक बार फिर यह साबित करता है कि भारत का संविधान और न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखने में सक्षम हैं। अदालत ने न केवल कानून का पालन सुनिश्चित किया, बल्कि समाज में शांति और न्याय की भावना को भी बढ़ावा दिया।

इस ऐतिहासिक निर्णय ने एक बार फिर यह स्थापित कर दिया कि भारत की न्याय प्रणाली अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।


जय हिंद 🇮🇳

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