मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट्स के रवैये पर इन दिनों गंभीर सवाल उठ रहे हैं। ये सवाल इसलिए खड़े हो रहे हैं क्योंकि कई बार ऐसी घटनाएं सामने आती हैं, जब पश्चिमी देशों में महिला अधिकारों की पैरवी करने वाली एक्टिविस्ट्स, मुस्लिम देशों में हो रहे अत्याचारों और महिलाओं के शोषण पर चुप्पी साध लेती हैं। अफगानिस्तान, ईरान, यमन और सीरिया जैसे देशों में महिलाओं के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार की खबरें बार-बार सामने आती हैं, लेकिन इन मुद्दों पर बोलने की जगह, कई एक्टिविस्ट्स अपनी प्राथमिकताएं कहीं और रखती हैं। यह रवैया न केवल उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि उनके एजेंडे को भी कठघरे में खड़ा करता है।
यूरोप और अमेरिका में सक्रिय, लेकिन मुस्लिम देशों में मौन
पश्चिमी देशों में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे पर ये एक्टिविस्ट्स जोर-शोर से बात करती हैं। उनके भाषण, प्रदर्शन और लेखन से ऐसा प्रतीत होता है कि वे महिलाओं के अधिकारों को लेकर पूरी तरह से प्रतिबद्ध हैं। यूरोप में हिजाब पहनने पर हो रहे विवादों या अमेरिका में मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभाव की घटनाओं पर ये तुरंत अपनी प्रतिक्रिया देती हैं। लेकिन जब बात मुस्लिम देशों में महिलाओं के खिलाफ होने वाले उत्पीड़न की आती है, तो उनकी आवाज धीमी पड़ जाती है या पूरी तरह से खामोश हो जाती है।

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अफगानिस्तान में तालिबान ने सत्ता में आने के बाद महिलाओं के अधिकारों को लगभग समाप्त कर दिया। महिलाओं को स्कूल और कॉलेज जाने से रोका जा रहा है। वहीं, ईरान में महिलाओं को जबरन हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जो महिलाएं इसका विरोध करती हैं, उन्हें जेलों में डाल दिया जाता है और सख्त सजाएं दी जाती हैं। यमन और सीरिया जैसे युद्ध प्रभावित क्षेत्रों में महिलाओं को यौन हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन का सामना करना पड़ता है। लेकिन इन गंभीर मुद्दों पर मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट्स का रवैया उदासीन नजर आता है।
अफगानिस्तान और ईरान: लगातार दमन, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं
अफगानिस्तान में जब तालिबान ने सत्ता पर कब्जा किया, तो महिलाओं के अधिकारों को सबसे पहले निशाना बनाया गया। महिलाओं के लिए स्कूल और कॉलेज जाने पर पाबंदी लगा दी गई, उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर घूंघट या बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया गया, और कामकाजी महिलाओं को उनके पदों से हटा दिया गया। यह एक ऐसा देश है, जहां महिलाओं को उनकी शिक्षा और रोजगार के अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।
ईरान में स्थिति और भी चिंताजनक है। यहां महिलाओं को हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया जाता है, और यदि वे इसका विरोध करती हैं, तो उन्हें जेल में डाल दिया जाता है। हाल के वर्षों में, ईरान में कई महिलाएं हिजाब के खिलाफ आवाज उठाने के लिए सड़कों पर उतरीं। उन्हें क्रूर दमन का सामना करना पड़ा, लेकिन इन महिलाओं को अंतरराष्ट्रीय समर्थन नहीं मिला। जो एक्टिविस्ट्स यूरोप और अमेरिका में समान मुद्दों पर आवाज उठाती हैं, वे यहां खामोश रहीं।
यमन और सीरिया में महिलाओं की दुर्दशा पर खामोशी
यमन और सीरिया में चल रहे संघर्ष और युद्ध के हालात ने महिलाओं की स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। यमन में महिलाओं को शारीरिक और मानसिक शोषण का सामना करना पड़ रहा है। युद्धग्रस्त क्षेत्रों में महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा की घटनाएं आम हो गई हैं। कई महिलाएं अपने घर और परिवार को खो चुकी हैं और उन्हें शरणार्थी शिविरों में रहना पड़ रहा है।

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सीरिया में भी हालात बहुत बेहतर नहीं हैं। गृहयुद्ध के दौरान महिलाओं को बलात्कार और यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। वहां के शरणार्थी शिविरों में महिलाओं के लिए बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। यह देखकर हैरानी होती है कि इन मुद्दों पर भी मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट्स कोई ठोस कदम नहीं उठातीं।
पाकिस्तान और अन्य मुस्लिम देशों में गंभीर समस्याएं
पाकिस्तान में भी महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है। ऑनर किलिंग, बाल विवाह, और घरेलू हिंसा जैसी घटनाएं यहां आम हैं। हर साल हजारों महिलाएं ऑनर किलिंग का शिकार होती हैं। इसके बावजूद, इन मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहुत कम चर्चा होती है।
इसके अलावा, सऊदी अरब जैसे देशों में महिलाओं के लिए सख्त नियम और कानून हैं। ड्राइविंग से लेकर शिक्षा और रोजगार तक, कई क्षेत्रों में महिलाओं को पुरुषों पर निर्भर रहना पड़ता है। इन देशों की महिलाओं की दुर्दशा को देखकर लगता है कि इनकी मदद के लिए एक ठोस अंतरराष्ट्रीय प्रयास की जरूरत है।
क्या है मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट्स की जिम्मेदारी?
एक्टिविस्ट्स की जिम्मेदारी केवल चुनिंदा मुद्दों पर ध्यान देना नहीं है। यदि वे सच में महिलाओं के अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध हैं, तो उन्हें हर जगह और हर परिस्थिति में महिलाओं के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। पश्चिमी देशों में भले ही महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़े, लेकिन मुस्लिम देशों में महिलाओं की दुर्दशा कहीं अधिक गंभीर है। वहां के हालात को नजरअंदाज करना उन महिलाओं के साथ अन्याय है, जो अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं।
निष्कर्ष
मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट्स का दोहरा रवैया यह साबित करता है कि उनकी प्राथमिकता असल में महिलाओं के अधिकार नहीं, बल्कि किसी खास एजेंडे को आगे बढ़ाना है। यदि वे अपनी विश्वसनीयता बनाए रखना चाहती हैं, तो उन्हें हर जगह समान रूप से महिलाओं के लिए खड़ा होना होगा। चाहे वह अफगानिस्तान हो, ईरान हो, यमन हो, या अमेरिका—महिलाओं के अधिकार हर जगह समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
महिलाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष केवल एक स्थान तक सीमित नहीं रह सकता। यह एक वैश्विक मुद्दा है, जिसे वैश्विक दृष्टिकोण और निष्पक्षता के साथ देखना होगा। मुस्लिम महिला एक्टिविस्ट्स को यह समझना चाहिए कि उनकी चुप्पी उन लाखों महिलाओं के लिए निराशा का कारण बनती है, जो अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। उन्हें हर जगह और हर स्थिति में महिलाओं के लिए न्याय और समानता की आवाज बुलंद करनी चाहिए। यही उनकी असली जिम्मेदारी है।
जय हिंद 🇮🇳
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